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अचानक (1973)

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  अचानक   आज पर्दानशीं पर हम बात कर रहे हैं 1973 की फ़िल्म _“अचानक”_ के विषय में। पाप और पुण्य की परिभाषा और उनके दायरे, सही और ग़लत की मान्यताएँ, दृष्टिकोण के बदल देने पर सही का ग़लत और ग़लत का सही हो जाना, ये बातें बड़ी ही जटिल और उलझाने वाली हैं। इस फ़िल्म में इन्ही बातों की तहों को उधेड़ने और इन सवालों को उठाने की कोशिश की गई है।   लोकप्रिय गीतकार गुलज़ार ने अनेक फ़िल्मों का निर्देशन किया है। लगभग हर फ़िल्म मानवीय रिश्तों की गहराइयों को अलग अलग अंदाज में प्रदर्शित करती है। मेरे विचार से ये फ़िल्म उतनी ही गहराइयाँ को टटोलने की कोशिश करती हुई होते हुए भी, उनकी दूसरी फ़िल्मों  से बिल्कुल भिन्न है। इसकी कहानी एक थ्रिलर की तरह प्रदर्शित की गई है।  ख़्वाजा अहमद अब्बास की कहानी पर आधारित और हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्मित ये कहानी भारतीय नौसेना के अधिकारी  कवस एम नानावटी की अपने दोस्त प्रेम आहूजा के क़त्ल की सच्ची घटना से प्रेरित है।  कहानी में जिस किस्म के सवाल उठाए गए हैं उन्हे देखकर, गुलज़ार का ही एक शेर जेहन में आता है - “क्या बुरा है क्या भला  हो सके तो ज...

चार दिल चार राहें

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चार दिल चार राहें  चार लोग क्या कहेंगे सोच सोच कर समाज की कुरीतियाँ, विषमताएँ और इनमें छिपा अत्याचार चला ही जा रहा है। चार वर्णों में समाज को बाँट कर, हम बस यही सोच सोच कर बंधनों की इस चार-दीवारी में क़ैद होकर रह जाते हैं कि कहीं चार लोग, चार बातें न सुना दें। और अंत में चार कंधों पर अपने सपनों को चारों खाने चित्त करके , अलविदा हो जाते हैं।  लेकिन इस चार के चक्कर में कई बार हम किसी ऐसे चौराहे पर भी पँहुच जाते हैं, जहाँ हमें कई राहें मिलती हैं। तब फ़ैसला हम पर होता है कि हम उन्ही राहों पर चलते जाएँ जहाँ सदियों से लोग जा रहे हैं, या फिर मुश्किल नज़र आ रही दूसरी राहों पर जाने की हिम्मत भी जुटाएँ।  चार राहें जो अलग अलग जगह से आ/जा रही हैं, उनका एक चौराहे पर मिलना, एक तरह का रूपक भी है।  ख़्वाजा अहमद अब्बास कृत “चार दिल चार राहें” इसी रूपक के आसपास बुनी गई है।  आज पर्दानशीं पर हम बात करेंगे, लोगों के नज़रों और स्मृति से लगभग पूरी तरह विलुप्त हो चुकी 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म “चार दिल चार राहें” के विषय में।  इस फ़िल्म को अपने समय में सफलता नहीं मिली और उसके बाद भी इसक...

मुक्ति भवन

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  मुक्ति भवन ओशो ने “मैं मृत्यु सिखाता हूँ” पुस्तक में कहा है , “जन्म और मृत्यु में गुण का फ़र्क नहीं है, सिर्फ़ मात्रा का फ़र्क है। ये विलोम शब्द नहीं है। जन्म बढ़ते-बढ़ते मृत्यु बन जाती है। इसका मतलब ये कि जन्म और मृत्यु एक ही चीज़ के दो बिन्दु हैं।  न जाने कैसी नासमझी में, न मालूम किस दुर्दिन में आदमी को यह ख़्याल बैठ गया कि जन्म और मृत्यु में विरोध है। हम जीना चाहते हैं, हम मरना नहीं चाहते। और हमें यह पता नहीं है कि हमारे जीने में ही मरना छिपा ही है। और जब हमने एक बार तय कर लिया कि हम मरना नहीं चाहते, तो उसी वक़्त तय हो गया कि हमारा जीना भी कठिन हो जाएगा।” मृत्यु, मृत्यु की प्रक्रिया की शुरुआत, और मृत्यु का स्वीकार्य-  बेहद गूढ़ और जटिल विषय है। अनेक महापुरुषों ने व्याख्या की लेकिन तब भी हम जीवन और मृत्यु को एक ही चीज़ के दो सिरे मान पाने में असमर्थ होते हैं। मृत्यु क्यों, और मृत्यु के बाद क्या, मुक्ति, मोक्ष इन सारी बातों के बारे में तो कल्पना और विवाद किया जा सकता है,  लेकिन मृत्यु के बारे में एक बात तयशुदा रूप से कही जा सकती है। वह यह कि इस प्रक्रिया का प्रभाव मृत्यु पा...

गाँधी माय फ़ादर (Gandhi my father)

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गाँधी माय फ़ादर (Gandhi my father) गुलज़ार ने एक गीत में कहा है -    “तुम्हें ये ज़िद थी कि हम बुलाते, हमें यह उम्मीद वो पुकारें। है नाम होंठों पे अब भी लेकिन, आवाज़ में पड़ गई दरारें” हम सब अपने जीवन में कभी न कभी ऐसी दुविधाओं से अक्सर जूझते हैं, जिसमें हमें चुनाव करना पड़ता है राह और हमसफ़र के बीच, सिद्धांत और साथी के बीच, अपने सत्य और अपनों के सत्य के बीच।  जब हम आप भी इस दुविधा से गुज़रते  हैं तो एक महात्मा के पदवी पाने वाले इंसान और उसके आसपास के लोग कैसे बच सकते हैं। क्या इन्ही दुविधाओं के जूझना, संघर्षों का सामना करना और बिखर जाने की स्तिथि तक वज्रपात सहते रहना, ही महात्मा होना है? पता नहीं। आज परदानशीं ब्लॉग पर हम फ़िरोज़ अब्बास ख़ान कृत “Gandhi my father” पर बात कर रहे हैं।  फ़िल्म 2007 में प्रदर्शित हुई थी और गांधीजी के सबसे बड़े  पुत्र हीरालाल गाँधी और स्वयं गांधीजी के संबंध और उन संबंधों की यात्रा पर आधारित है।  चंदुलाल दलाल की किताब “Heeralal Gandhi: A Life” और उनकी पौत्री नीलमबेन परिख की पुस्तक “Gandhiji’s Lost Jewel” पर आधारित कथा, पटकथा ख़ान ने ही लि...

हामिद

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  हामिद  फ़िल्म के एक दृश्य में कश्ती बनाने वाले रसूल चाचा, बशीर मियां से कहते हैं, “बच्चों के उसूलों पर अगर दुनिया चल पाती, तो सचमुच में जन्नत हो गई होती”।   किंचित यही पंक्ति शायद इस फ़िल्म की आत्मा बयां करती है। पर्दानशीं पर हम आज बात कर रहे हैं 2018 में प्रदर्शित हुई फ़िल्म “हामिद” के विषय में।   “हामिद” कश्मीर की पृष्ठभूमि में एक सात साल के बच्चे  की अपने पिता को ढूँढने की कहानी है। जब आप कश्मीर पर बनी फ़िल्म की बात करते हैं तो सबसे पहले दिमाग में दो चीज़ें आती है। एक ओर तो मन में घूमती है  कश्मीर घाटी की निराली छटा, वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता। बर्फ़ से भरी  पहाड़ियाँ, और चिनारों और सनोबर के दरख्तों से भरी वादियाँ।  वहीं दूसरी ओर, आँखों के सामने आते हैं वो दृश्य जो वहाँ पर व्याप्त राजनैतिक समस्याओं और अस्थिरता की कहानी कहते हैं। छावनी की तरह नज़र आने वाली सड़कें और मोहल्ले, सड़क पर बिखरे पत्थर, जगह जगह कभी कर्फ्यू का सन्नाटा तो कभी आज़ादी के नारों के बीच बेक़ाबू भीड़ का पथराव। जुम्मे की नमाज़ के रोज़ कश्मीर के मुस्लिम समाज का भीड़ में नमाज़ अदा करना ...

शेरनी

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  एक बाघिन , जिसे आमतौर पर शेरनी कहा जाता है, का स्वभाव, आम धारणा के विपरीत, बड़ा ही निराला होता है। शेरनी अक्सर शांत और एकांत में रहती है और सौम्य स्वभाव से अपनी गरिमा बनाए रखती है। अपनी शक्ति का बेमतलब प्रदर्शन करना उसकी फ़ितरत नहीं होती। लेकिन उसके आसपास मौज़ूद जानवर इस परिष्कृत वृत्ति के पीछे छिपी उसकी ताक़त को भली भांति समझते हैं और होशियार रहते हैं। क्यूंकी शेरनी अपनी ज़रूरत और अपनी संतानों की रक्षा के लिए गहरा और असरदार वार कभी भी कर सकती है।  अमित मसूरकर कृत  “शेरनी” में विद्या विंसेंट का क़िरदार का स्वभाव लगभग ऐसा ही है।  आज इस ब्लॉग पर हम बात कर रहे हैं, ऑस्कर सम्मान 2017 में  भारत की आधिकारिक प्रविष्टि “न्यूटन” के निर्देशक अमित मसूरकर की अगली कृति “शेरनी” के विषय में।  2021 में प्रदर्शित हुई “शेरनी” भी “न्यूटन” की तरह एक असरदार और अलहदा कहानी है और ये भी अक्सर नज़रंदाज़ किए जा रहे विषय पर केंद्रित है।  लेकिन “न्यूटन” जैसी लोकप्रियता नहीं अर्जित कर पाई।  निर्देशक अमित मसूरकर और लेखिका (कथा , पटकथा और संवाद) आस्था टीकु, हमें मध्य प्रदेश के बालाघा...

थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ

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थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ अटल बिहारी वाजपेयी जी की पंक्तियाँ हैं - “भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें- बुझी हुई बाती सुलगाएँ। आओ फिर से दिया जलाएँ” गहरे अंधकार में, जब कहीं कोई राह न सूझे, रात गहराती जाए, सहर न आए।  जब निराशा के बादलों में आप पूरी तरह से ढके हों और उम्मीद की किरणें कहीं नज़र न आयें।  आशा का दामन थामना तभी सबसे ज़्यादा ज़रूरी हो जाता है। “आशा” जीवित रहने की अवस्था में निहित सबसे आदिम और सबसे आवश्यक गुण है। जीवन नाम के इस सफ़र का ईंधन आशा ही है। बेहद सरल बात है, लेकिन कभी कभी बेहद कठिन भी। बस इसी सरल लेकिन ज़रूरी  भाव पर आधारित है अमोल पालेकर कृत - “थोड़ा सा रूमानी हो जाएँ”  वर्ष था 1990। एक तरफ़ राजकुमार संतोषी की “घायल” , लोगों को “ढाई किलो का हाथ” के जलवे दिखा रही थी , वहीं महेश भट्ट की “आशिक़ी” प्रेम गीतों के साथ सफलता के नए कीर्तिमान हासिल कर रही थी। इस बीच एनएफडीसी के छोटे से बजट और दूरदर्शन द्वारा प्रस्तुत, ये फ़िल्म लोगों की नज़रों से चूक जाए , इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी।  ये फ़िल्म 1954 में लिखे गए एन रिचर्ड नैश क...

रघु रोमियो

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  रघु रोमियो  रघु बारिश में भीगता हुआ अपने घर पहुँचता है और गीली शर्ट उतार देता है। उसकी माँ घर में जगह जगह टपकते पानी से सामान बचाने के लिए बर्तन रख रही है, और आते ही रघु पर बरस पड़ती है कि कबसे कह रही हूँ घर की छत ठीक करा दे। रघु सारी बातें नज़रंदाज़ करके पास रखे टीवी पर पानी टपकता हुआ देखकर बौखला जाता है और सीधा टीवी को बचाने कि जद्दोजहद में लग जाता है। बिना शर्ट के अपनी इकहरी काया से बक्से जैसा टीवी उठाए, रघु घर में टीवी को रखने की जगह खोज रहा है और माँ माथा पीटते हुए घर के बाकी सामान को बचाने में और सफ़ाई में लगी हुई है। ऊपर दिए गए दृश्य से ही आप अंदाज़ा लगा सकते हैं, इस फ़िल्म के नायक की पृष्ठभूमि का और उसके द्वन्द्व का। निर्देशक और लेखक रजत कपूर की “रघु रोमियो” अपने ही तरह की एक मज़ेदार कहानी है और साथ ही तीखा व्यंग्य अपने अंदर छुपाये हुए है।  शीर्ष भूमिका में विजय राज, और साथ ही मुख्य भूमिकाओं में सादिया सिद्दीक़ी, सौरभ शुक्ला, मारिया गोरेटी वारसी, और अन्य भूमिकाओं में सुरेखा सीकरी, वीरेंद्र सक्सेना, मनु ऋषि। इन बेहद अच्छे कलाकारों के द्वारा अभिनीत ये फ़िल्म एक “डार्क/ब्ल...