चार दिल चार राहें

चार दिल चार राहें 


चार लोग क्या कहेंगे सोच सोच कर समाज की कुरीतियाँ, विषमताएँ और इनमें छिपा अत्याचार चला ही जा रहा है। चार वर्णों में समाज को बाँट कर, हम बस यही सोच सोच कर बंधनों की इस चार-दीवारी में क़ैद होकर रह जाते हैं कि कहीं चार लोग, चार बातें न सुना दें। और अंत में चार कंधों पर अपने सपनों को चारों खाने चित्त करके , अलविदा हो जाते हैं। 


लेकिन इस चार के चक्कर में कई बार हम किसी ऐसे चौराहे पर भी पँहुच जाते हैं, जहाँ हमें कई राहें मिलती हैं। तब फ़ैसला हम पर होता है कि हम उन्ही राहों पर चलते जाएँ जहाँ सदियों से लोग जा रहे हैं, या फिर मुश्किल नज़र आ रही दूसरी राहों पर जाने की हिम्मत भी जुटाएँ। 


चार राहें जो अलग अलग जगह से आ/जा रही हैं, उनका एक चौराहे पर मिलना, एक तरह का रूपक भी है।  ख़्वाजा अहमद अब्बास कृत “चार दिल चार राहें” इसी रूपक के आसपास बुनी गई है। 


आज पर्दानशीं पर हम बात करेंगे, लोगों के नज़रों और स्मृति से लगभग पूरी तरह विलुप्त हो चुकी 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म “चार दिल चार राहें” के विषय में।  इस फ़िल्म को अपने समय में सफलता नहीं मिली और उसके बाद भी इसको याद करने वाले लोग कम ही हैं। इसकी कोई अच्छी प्रिंट भी कहीं उपलब्ध नहीं है। 


सबसे पहले फ़िल्म के कलाकारों को जान लें। प्रमुख भूमिकाओं में हैं - राज कपूर, मीना कुमारी, अजीत, निम्मी, शम्मी कपूर, कुमकुम और पी. जयराज। इनके अलावा मुख्य भूमिकाओं में अभिनय किया है - डेविड, अनवर हुसैन, अचला सचदेव और रशीद ख़ान। यह फ़िल्म अपने समय के बड़े-बड़े सितारों से सुसज्जित थी। 


फ़िल्म की कहानी बड़ी रोचक और आशावादी है। जैसा कि शीर्षक से समझ आता है, कहानी चार कहानियों का समागम है।  नीचे के चार गद्यांश(पैराग्राफ़) हर एक कहानी का सार, संक्षेप में बताते हैं।  चूंकि इस फ़िल्म के अच्छे प्रिंट इंटरनेट पर मौज़ूद नहीं है, इसे डूबकर देखने में खासी परेशानी हो सकती है, इसीलिए इसकी कहानी तनिक विस्तार से यहाँ लिखी है, जिससे अगर आप इसे देखें तो इस जानकारी के कारण आप इस फ़िल्म के विन्यास और उसके विषय-वस्तु से बेहतर जुड़ सकें। 


पहली कहानी है एक छोटे से गाँव के ऊंची जाति के गोविंदा और एक चमार जाति की बाल-विधवा चावली के प्रेम की कहानी। गोविंदा बारह साल शिक्षा के लिए बाहर रहने के बाद अपने गांव लौटता है। एक स्थानीय अछूत लड़की चावली से दोस्ती के कारण उसके पिता ने उसे दूर भेज दिया था। लेकिन दोनों अभी भी एक दूसरे से प्रेम करते हैं। समुदाय के विरोध का सामना करने के बावजूद, गोविंदा चावली को उससे शादी करने के लिए मना लेता है और वे शादी करने के लिए मंदिर जाते हैं। पुजारी उन्हें मना कर देता है और दोनों पक्षों के गाँव वाले गुस्से में आ जाते हैं। चावली का घर जला दिया जाता और गोविंदा टूटे दिल के साथ अपने परिवार और समुदाय को त्याग कर दुःख में भटकता फिरता है । अंत में एक चौराहे पर आता है जहाँ उसे चावली की पायल मिलती है। इस उम्मीद में कि चावली जिंदा है, उससे फिर मिल पाने की चाह में वह उसी चौराहे पर रहने का फैसला करता है। 


दूसरी कहानी, एक ग़रीब लेकिन ईमान वाले पठान और एक तवायफ़ की प्रेम कहानी है। कहानी दिलावर ख़ान नाम के एक ड्राइवर की है जो सुल्तानाबाद के नवाब के लिए काम करता है। नवाब परेशान है क्यूंकी भारत की लोकतान्त्रिक  सरकार सभी राजे-रजवाड़ों, नवाबों-निज़ामों की सल्तनतों को ख़त्म करके भारतीय गणराज्य में सम्मिलित कर रही है । नवाब के सलाहकार और दोस्त उसे सुझाव देते हैं प्यारी नाम की एक लड़की को बुलाने के लिए। जो उसका मनोरंजन करने के लिए गा सकती है और नृत्य कर सकती है। दिलावर ख़ान को प्यारी को लाने के लिए भेजा जाता है और शुरू में यह मानते हुए कि वह एक वेश्या है, उसके साथ असभ्य व्यवहार करता है। लेकिन जब प्यारी की कला और व्यवहार देखता है तो दिलावर की उसके बारे में धारणा बदल जाती है। वह उसके साथ प्यार में पड़ जाता है और यहां तक कि उससे अपने प्यार का इज़हार भी करता है, लेकिन अपने धर्म के चलते, उसकी मां, एक पूर्व वेश्या, को अपने परिवार के हिस्से के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं है। इस बात पर उन दोनों का रिश्ता टूट जाता है। प्यारी उसी चौराहे पर आकर अपना जीवन बसर करने लगती है। 


तीसरी कहानी है ग़रीब और छोटी-छोटी नौकरी करके अपना बसर करने वाले  जॉनी ब्रगेंज़ा  और स्टेला की प्रेम कहानी। जॉनी एक कार के पंचर टायर को ठीक करने में एक रईस परिवार की मदद करता है और उनके साथ होटल पर्बत पँहुच जाता है जहाँ वह नौकरी करके मेहनत से अपना पेट पालने लगता है। उस परिवार की ग़रीब आया स्टेला और जॉनी में प्यार हो जाता है। स्टेला अपने पिता के तपेदिक के इलाज के लिए पैसे कमाने की कोशिश कर रही है।  जॉनी इस वजह से होटल के मालिक फरेरा से उधार मांगता है तो फरेरा उसे अपने अवैध शराब के कारोबार में फंसा देता है। और फिर उसे जेल भी भिजवा देता है। फरेरा, स्टेला की मजबूरी का फ़ायदा उठाकर उससे शादी कर लेता है। जॉनी जेल से छूटने के बाद, जब फरेरा से अपने पैसे लेने जाता है तो, स्टेला को उसकी पत्नी के रूप में देखकर बुरी तरह आहत और क्रोधित होकर वहाँ से चला जाता है।  जॉनी अपना मोटर गैरेज खोलकर और अपनी अवैध बूटलेगिंग गतिविधियों के साथ उसी चौराहे पर रहने लगता है। 


इसके बाद चौथी कहानी है मज़दूरों के नायक, समाजवाद को समाज की असमानताएँ और रूढ़ियों को दूर करने का हथियार मानने वाले, निर्मल बाबू की।  जो मज़दूरों को ठेकेदारों, बिचौलियों के अत्याचार से आज़ाद कर चौराहे पर आने वाले चौथी सड़क के पहाड़ को तोड़कर रास्ता बनाने के लिए प्रेरित करता है। इसी कहानी में अन्य तीनों कहानियों के धागे आपस में जुड़ते हैं। 


फ़िल्म देखें और जाने कि - क्या चावली जिंदा है? क्या गोविंदा अभी भी उसे ढूंढ रहा है? क्या चावली और गोविंदा का मिलन हो पाएगा? क्या दिलावर  ख़ान कभी अपने पठानी अहंकार से उबरकर प्यारी से सुलह करेगा? प्यारी और उसकी माँ कैसे जीविकोपार्जन कर रहे हैं?  स्टेला का क्या हुआ, क्या वह फरेरा के साथ खुश हैं? क्या वह और जॉनी कभी एक दूसरे के लिए अपने प्रेम के लिए रास्ता खोज पाते हैं? क्या निर्मल की सड़क बन पाएगी? 


और सबसे ज्वलंत प्रश्न: क्या भारत सभी के लिए समृद्धि और समानता का मार्ग खोज पाएगा? इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए “चार दिल चार राहें” जैसी वृहद फ़िल्म ज़रूर देखें। 


फ़िल्म में पहाड़ को तोड़कर रास्ता बनाने को एक प्रतीक के रूप में अब्बास प्रस्तुत करते हैं। समाजवाद के डाइनमाइट से रूढ़ियों और अत्याचारों के पहाड़ तोड़कर, सभी के लिए समानता का रास्ता बनाना, इस सम्मोहक कथानक की आत्मा है। 


फ़िल्म में कहानी, अभिनय, संगीत और सितारा-पहचान रखने वाले कलाकार सभी कुछ था। लेकिन समाजवाद के थीम पर बनी  “दो बीघा ज़मीन” या “नया दौर” जैसी सफलता यह फ़िल्म नहीं हासिल कर पाई। 


अनिल बिस्वास और साहिर ने फ़िल्म को कई सुंदर गीतों से संवारा है। “क़दम क़दम से, दिल से दिल मिला रहे हैं हम”  ऐसा गीत है जो “साथी हाथ बढ़ाना” और “धरती कहे पुकार के” की तरह ही एक जन-गीत है। 


के ए अब्बास ने हिन्दी फ़िल्म दुनिया में अनेकों बार हमें बड़ी बड़ी फिल्में दी हैं, कहानीकार, पटकथा-कार, संवाद, निर्माता और निर्देशक के रूप में।  श्री-420, जागते-रहो, मेरा नाम जोकर, बॉबी और हिना जैसी फ़िल्में तो कोई नहीं भुला सकता और नीचा नगर के रूप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को किंचित पहली दफ़ा पहचान दिलायी। लेकिन उनके समाज के कुरूप ढाँचों को तोड़ने का सपना देखने वाली यह फ़िल्म ज्यादातर दर्शकों की नज़रों से चूक गई।


यूट्यूब  पर यह फ़िल्म यहाँ उपलब्ध है- https://youtu.be/o8VpZgsFMNA । इसके अलावा अमेज़न प्राइम पर ईरोसनॉव के माध्यम से फ़िल्म यहाँ पर उपलब्ध है - https://www.amazon.com/gp/video/detail/B082L3GSHQ/ref=atv_dp_share_cu_r । 


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